अपनी धरती के साथ रहता हूं
उसके सब धूप-ताप सहता हूं
और कभी जेठ जैसा दहता हूं
सब परिन्दों के साथ उड़ता हूं
सारी नदियों के साथ बहता हूं
जागता हूं सुबह को सूरज सा
शाम को खण्डहर सा ढहता हूं
इसमें तुम भी हो और ज़माना भी
यूं तो मैं अपनी बात कहता हूं
अपनी धरती के साथ रहता हूं
उसके सब धूप-ताप सहता हूं
और कभी जेठ जैसा दहता हूं
सब परिन्दों के साथ उड़ता हूं
सारी नदियों के साथ बहता हूं
जागता हूं सुबह को सूरज सा
शाम को खण्डहर सा ढहता हूं
इसमें तुम भी हो और ज़माना भी
यूं तो मैं अपनी बात कहता हूं
रास्ता ही भूल जाओ एक दिन
आओ मेरे घर भी आओ एक दिन
बासी रोटी से ज़रा आगे बढ़ो
उसको टॉफ़ी भी खिलाओ एक दिन
क्या मिलेगा ऐसे गुमसुम बैठ कर,
साथ मेरे गुनगुनाओ एक दिन
बर्फ़ सम्बन्धों की पिघलेगी ज़रूर
धूप जैसे मुस्कराओ एक दिन
घर के सन्नाटे में गुम हो जाओगे
दौड़ती सड़कों पे आओ एक दिन
चाहता हूं मगर नहीं लगता
मेरा घर मेरा घर नहीं लगता
जिसके साये में दो घड़ी दम लूं
ऐसा कोई शजर नहीं लगता
अजनबी लोग, अजनबी चेहरे
ये शहर वो शहर नहीं लगता
ये महावर,ये मेंहदियां, ये पाँव
तू मेरा हमसफ़र नहीं लगता
ये धमाके तो रोज़ होते हैं
अब परिन्दों को डर नहीं लगता
दिल को लगते हैं लोग अच्छे भी
पर कोई उम्र भर नहीं लगता
तेरी चारागरी में उम्र कटी
आज तक तो असर नहीं लगता
आइने में भी अजनबी है कोई
ये मुझे वो अमर नहीं लगता
सभी से दोस्ताना हो गया है
तुम्हें देखे ज़माना हो गया है
खिलौनों के लिये रोता नहीं है
मेरा बेटा सयाना हो गया है
भरी महफ़िल में सच कहने लगा है
इसे रोको- दिवाना हो गया है
मुखौटा इक नया ला दो कहीं से
मेरा चेहरा पुराना हो गया है
कभी संकेत में कुछ कह दिया था
उसी का अब फ़साना हो गया है