Tuesday, February 9, 2010

अपनी धरती

अपनी धरती के साथ रहता हूं

उसके सब धूप-ताप सहता हूं


पूस जैसा कभी ठिठुरता हूं

और कभी जेठ जैसा दहता हूं

 

सब परिन्दों के साथ उड़ता हूं

सारी नदियों के साथ बहता हूं

 

जागता हूं सुबह को सूरज सा

शाम को खण्डहर सा ढहता हूं

 

इसमें तुम भी हो और ज़माना भी

यूं तो मैं अपनी बात कहता हूं

Wednesday, January 27, 2010

बीन का

बीन का रागिनी से रिश्ता हो
साँस का ज़िन्दगी से रिश्ता हो

ऐसी बस्ती बसाइये जिसमें
सबका सबकी ख़ुशी से रिश्ता हो

अपनी गिनती है देवताओं में
किस लिये आदमी से रिश्ता हो

ये दुमहले गिरें तो अपना भी
धूप से, रौशनी से रिश्ता हो

अब तो राजा हैं द्वारिका के किशन
क्यों भला बाँसुरी से रिश्ता हो

Monday, January 11, 2010

जो गया

जो गया

सो गया

 

बीज कुछ

बो गया

 

जो रहा

रो गया

 

तू कहां

खो गया

 

जो हुआ

हो गया

 

 

Wednesday, January 6, 2010

रास्ता ही

रास्ता ही भूल जाओ एक दिन

आओ मेरे घर भी आओ एक दिन

 

बासी रोटी से ज़रा आगे बढ़ो

उसको टॉफ़ी भी खिलाओ एक दिन

 

क्या मिलेगा ऐसे गुमसुम बैठ कर,

साथ मेरे गुनगुनाओ एक दिन

 

बर्फ़ सम्बन्धों की पिघलेगी ज़रूर

धूप जैसे मुस्कराओ एक दिन

 

घर के सन्नाटे में गुम हो जाओगे

दौड़ती सड़कों पे आओ एक दिन

                          

Friday, November 6, 2009

चाहता हूं मगर

चाहता हूं मगर नहीं लगता

मेरा घर मेरा घर नहीं लगता

 

जिसके साये में दो घड़ी दम लूं

ऐसा कोई शजर नहीं लगता

 

अजनबी लोग, अजनबी चेहरे

ये शहर वो शहर नहीं लगता

 

ये महावर,ये मेंहदियां, ये पाँव

तू मेरा हमसफ़र नहीं लगता

 

ये धमाके तो रोज़ होते हैं

अब परिन्दों को डर नहीं लगता

 

दिल को लगते हैं लोग अच्छे भी

पर कोई उम्र भर नहीं लगता

 

तेरी चारागरी में उम्र कटी

आज तक तो असर नहीं लगता

 

आइने में भी अजनबी है कोई

ये मुझे वो अमर नहीं लगता

 

Tuesday, October 20, 2009

कब तक

कब तक धूप चुरायेंगे
ये बादल छँट    जायेंगे

आज तुम्हारा दौर सही
अपने दिन भी आयेंगे

ये परेड के फ़ौजी हैं
लड़ने से कतरायेंगे

फूल यहीं पर सूखेगा
पंछी तो उड़ जायेंगे

दर्द थमा तो चल देंगे
दर्द बढ़ा तो  गायेंगे

Saturday, October 3, 2009

सभी से

सभी से दोस्ताना हो गया है

तुम्हें देखे ज़माना हो गया है

 

खिलौनों के लिये रोता नहीं है

मेरा बेटा सयाना हो गया है

 

भरी महफ़िल में सच कहने लगा है

इसे रोको- दिवाना हो गया है

 

मुखौटा इक नया ला दो कहीं से

मेरा चेहरा पुराना हो गया है

 

कभी संकेत में कुछ कह दिया था

उसी का अब फ़साना हो गया है